अल्मोड़ा के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए हाल ही में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसका नेतृत्व पार्षद वैभव पांडेय ने किया। यह अभियान स्वामी विवेकानंद के अल्मोड़ा यात्रा के संदर्भ में शुरू किया गया, जो भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी यात्रा के दौरान देशभर में आत्म-जागरण, आत्म-निर्भरता और राष्ट्रीय एकता का संदेश फैलाया था। उनका अल्मोड़ा आगमन भी भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रसार में एक अहम कड़ी था।
आज वही गौरवमयी संस्कृति खतरे में पड़ती नजर आ रही है। अल्मोड़ा के प्रवेश द्वार “करबला” पर विवेकानंद द्वार के पास विदेशी मदिरा की दुकान स्थित है, जो इस ऐतिहासिक स्थल और संस्कृति पर भारी पड़ रही है। यह दुकान स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि यह एक ऐसे स्थान पर है जो भारतीय संस्कृति, विशेष रूप से अल्मोड़ा की सांस्कृतिक धरोहर के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। यह दुकान न केवल स्वामी विवेकानंद की यात्रा के संदर्भ में असंगत प्रतीत होती है, बल्कि स्थानीय नागरिकों की भावना और अल्मोड़ा की पहचान के लिए भी एक नुकसानदायक है।
इस मुद्दे को लेकर पार्षद वैभव पांडेय के नेतृत्व में स्थानीय जनता ने हस्ताक्षर अभियान चलाया। इस अभियान में पार्षद वैभव पांडेय के साथ अन्य प्रमुख जनप्रतिनिधि और समाजसेवी भी शामिल हुए, जिनमें पार्षद मधु बिष्ट, चंचल दुर्गापाल, दीपक कुमार, अनूप भारती, विकास कुमार, गुंजन चम्यल, गौरव भंडारी (सचिव छात्र संघ), हेमंत मेहरा, राहुल, गोविंद, रंजना, बसंत कांडपाल, और रोहित बोरा प्रमुख थे।
अभियान के दौरान, स्थानीय लोगों ने इस दुकान को विवेकानंद द्वार से स्थानांतरित करने की मांग की। उनका मानना था कि यह दुकान अल्मोड़ा की संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान पहुंचा रही है। लोगों का कहना था कि स्वामी विवेकानंद की यात्रा और उनके द्वारा प्रचारित आत्म-निर्भरता, राष्ट्रीय एकता, और भारतीय संस्कृति के संदेश को ध्यान में रखते हुए, यह स्थान इस प्रकार की दुकान के लिए उपयुक्त नहीं है।
अल्मोड़ा की सभ्रांत जनता ने इस हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से प्रशासन से अपील की है कि इस दुकान को तत्काल वहां से हटाया जाए और क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा की जाए। उनका यह भी कहना था कि पार्षद वैभव पांडेय और अन्य जनप्रतिनिधि हमेशा अल्मोड़ा की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रहते हैं और इस अभियान के माध्यम से उन्होंने एक बार फिर से जनता की आवाज को प्रशासन तक पहुंचाया। यह अभियान इस बात का प्रतीक है कि जनता अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए हमेशा खड़ी रहेगी।