मिथुन चक्रवर्ती, भारतीय सिनेमा के एक प्रतिष्ठित और बहुचर्चित अभिनेता, को 8 अक्टूबर को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा में उनके योगदान और अद्वितीय अभिनय कौशल को मान्यता देने का एक महत्वपूर्ण संकेत है। मिथुन का सफर हमेशा से ही विवादों और उतार-चढ़ावों से भरा रहा है, लेकिन उनकी मेहनत और प्रतिभा ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में एक विशेष स्थान दिलाया।
प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत
मिथुन चक्रवर्ती का जन्म 16 जून 1950 को पश्चिम बंगाल के कलकत्ता में हुआ था। वे एक साधारण परिवार से हैं और उनके जीवन में संघर्ष की कोई कमी नहीं रही। उन्होंने अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद फिल्म उद्योग में करियर बनाने का निर्णय लिया। मिथुन ने पहली बार 1976 में “मृगया” फिल्म से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। इस फिल्म में उनके काम को काफी सराहा गया, और इससे उनकी पहचान बनने लगी।
नक्सलवाद का संक्षिप्त इतिहास
हालांकि मिथुन का करियर चक्रीय था, लेकिन उनकी ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नक्सली गतिविधियों से जुड़ा रहा। युवा अवस्था में, मिथुन ने नक्सलवाद की विचारधारा को अपनाया और इसके कारण उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। नक्सल आंदोलन में उनकी भागीदारी ने उन्हें कई चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूर किया। लेकिन इस दौर के बाद, उन्होंने अपने करियर को फिर से गति दी और फिल्म इंडस्ट्री में लौट आए।
फिल्म इंडस्ट्री में वापसी
मिथुन की वापसी ने उन्हें एक नई पहचान दी। 1980 और 90 के दशक में, वे बॉलीवुड में एक्शन और ड्रामा फिल्मों के लिए जाने जाते थे। “डिस्को डांसर,” “क्लब,” “फूल और कांटे,” और “बॉलीवुड” जैसी फिल्मों ने उन्हें अपार लोकप्रियता दिलाई। उनकी शैली, अभिनय और डांसिंग स्किल्स ने उन्हें दर्शकों का दिल जीतने में मदद की। इस दौरान, उन्होंने 350 से अधिक फिल्मों में काम किया, जो भारतीय सिनेमा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

